
स्थानीय लोगों के लगातार हमलों की वजह से तैमुर के लिए दिल्ली से मुल्तान पहुँचने में आफत हो गयी थी। वापसी के लिए उसने पश्चिमी उत्तर प्रदेश से होते हुए निकलने की कोशिश की लेकिन वहां भी हरिद्वार के पास उसकी फौज ख़त्म होते होते बची। तैमूर 1398 में भारत आया था।
कुछ ऐसा ही हाल बाबर का भी रहा। वो अपनी आत्मकथा में कहता है कि वो दिल्ली से आगरा तक कभी बिना हमला झेले नहीं पहुँच पाया। बाबर 1530 में मरा था। इसके बाद मुगलों की ताकत को 1582 में महाराणा प्रताप ने कुचला और मेवाड़ हमेशा स्वतंत्र ही रह गया।
शिवाजी का राजतिलक 1675 में हुआ था और मराठों से लड़ते-लड़ते कंगाल हो गए औरंगजेब ने 1707 में दम तोड़ा। अब तारीखों का हिसाब देखेंगे तो गुरु नानक का जन्म 1469 में हुआ था और सिखों ने हथियारबंद होना 1699 में शुरू किया था।
ये आपको किसने सिखा दिया है कि हिन्दुओं को सुरक्षा के लिए किसी से गुहार लगानी पड़ी थी?
अपने पास की शाखा में दंड प्रहार के लिए आ सकते हैं, क्योंकि 16 दिसंबर को प्रहार महायज्ञ की पूर्णाहुति है याद रहे 16 दिसंबर को बांग्लादेश बनाना भारतीय सैनिकों की महान लड़ाई का परिणाम है ।
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