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स्पेशल स्टोरी कवरेज
बंगलौर के जयनगर में श्री राघवेन्द्र स्वामी मठ है। हर वर्ष वहां तीन दिनों के लिए राघवेंद्र अराधनोत्सव का आयोजन किया जाता है। इन तीन दिनों तक हर रोज सुबह चार बजे उठकर सुधा मूर्ति भी मंदिर में “सेवा” देने पहुँच जाती हैं। सुधा मूर्ति की “नेट वर्थ” यानी आर्थिक क्षमता करीब 2480 करोड़ रुपये की आंकी गयी थी। तस्वीर में करीब 2500 करोड़ रुपये की मालकिन आपको सब्जियां और भण्डार घर संभालती नजर आ रही हैं।
अगर आर्थिक क्षमता का आंकलन छोड़ भी दें तो सुधा मूर्ति ने “डॉलर बहु” (https://amzn.to/2RmP0y0) नाम की किताब से अपने लेखन की शुरुआत की थी। ये एक ऐसी कहानी है जिसमें एक भाई, जो बैंक में साधारण सी नौकरी करता है, उसकी पत्नी सिर्फ गृहणी होती है। वहीँ उसका दूसरा भाई विदेश में रहता था और उसकी पत्नी भी डॉलर में कमाती थी। सास जो कि आम तौर पर गृहणी के हर काम में मीन-मेख कर रही होती थी, वो एक बार विदेश जाती है और उसे अचानक अंतर समझ में आ जाता है।
ये किताब 2007 में आई थी और ये अभी भी बेस्टसेलर में 100वें नंबर के आस-पास टिकी होती है। सिर्फ लेखन में देखें तो भी सुधा मूर्ति की प्रतिष्ठा कोई कम नहीं है। इस बेस्टसेलर के अलावा भी उन्हें “वाइज एंड अदरवाइज” (https://amzn.to/33nYyyb), “थ्री थाउजेंड स्टिचेज” (https://amzn.to/2Rn1XHS), या फिर बच्चों के लिए लिखी गयी राम और कृष्ण की कहानियों की “द अपसाइड डाउन किंग” (https://amzn.to/3k9uJIv) जैसी अनेकों किताबों के लिए जाना जाता है।
तो सवाल है कि वो मंदिर के बाहर बैठी सब्जियां क्यों संभाल रही हैं? उनका कहना है कि कहीं अहंकार हावी ना हो जाए इसलिए वो हर वर्ष कुछ दिन “सेवा” में जुटी होती हैं। बाकी रहा सवाल मंदिर जाने या मंदिर में कोई सेवा देने का, तो ये उतना भी “ओह सो मिडिल क्लास” टाइप ओछा काम नहीं! कर के देखिये, अच्छा लगता है!



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