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लड्डू-बाफले'-मुँह में पानी ना आये तो बोलना

लड्डू_बाफले ,मुँह में पानी ना आये तो बोलना | बहुत कम लोग जानते हैं कि 'दाल-बाफले' शब्द चलन में ही नहीं था, मूलतः 'लड्डू-बाफले' कहा जाता था पर कुछ घाघ और मक्खीचूस प्रजाति के लोगों ने लड्डू का खर्च बचाने के चक्कर में इसे दाल बाफले बना मारा । लड्डू काटने में खूंखार सेकुलर जीवों ने भी षडयंत्र में सहयोग किया । चूंकि लड्डू में केशर होती है तो 'केशरिया' सहन कैसे हो, केशरिया हटाओ, हटाओ लड्डू । कुछ मरजीवे भी साथ हो गए होंगे जिनसे घी में तर बाफले खाते नहीं बनते । जिन्हें एक पूरा बाफला खाने में पसीना आ जाता है ऐसे फिसड्डी क्या खाकर लड्डू खाएंगे? तो लड्डू को विस्थापित कर दिया । कुछ अनाड़ी रसोइयों ने भी इस कुचक्र को घुमाने में हथेली लगाई । ये बावले साथ में चावल बना लेते हैं, अब बाफले के साथ चावल भी निगलने है तो लड्डू का सामना किस मुँह से करेगा कोई ?  ये बताओ भैया ये चावल का लड्डू बाफले के साथ क्या काम ? जोड़ ही नहीं बनती । आज एक बार फिर से पूरी थाली बताई जा रही है लड्डू बाफले धर्म मे आस्था रखने वाले श्रद्धालु ध्यान से श्रवण कर पुण्य लाभ ले ।  कम से कम हैसियत वाले व्यक्ति के लिए पाक-शास्त्र में उल्लेख है कि बेलपत्र की तरह तीन पदार्थ तो बनेंगे ही वो है लड्डू-बाफला और दाल । इनमें से कोई भी वस्तु कम नहीं हो सकती इसके बाद बढ़ने वाली समिधाएं हैं निम्बू, कढ़ी, पुदीने की चटनी, गट्टे की सब्जी, पातल-भाजी, गुजराती आलू, प्याज और लालमिर्च लहसून की झन्नाट चटनी । ये पूर्णता है इसके बाद इसमें कुछ भी बढ़ाने का निषेध है । कुछ बाफला द्रोही इसमें विजातीय मिठाई रख देते हैं जैसे मावाबाटी या रसगुल्ला, ऐसा करना पाप है पाप । और लड्डू बाफले के साथ चावल बनाना तो महापाप है । अतः विधि विधान का ध्यान रखें, नामकरण का ध्यान रखें,  बिना लड्डू की रसोई कभी भी ना बनाएं बल्कि संबोधन ही लड्डू बाफले करे । दाल बाफले बोलने की ज़रूरत ही नहीं । सीधी समझने वाली बात है दाल तो है ही साथ में, दाल नहीं बनेगी तो क्या सूखा बाफला खाएंगे ? एक बात और ध्यान दीजिए बाफले सिर्फ और सिर्फ घी में तर ही खाये जाते है कोई 'रूखा बाफला' माँगे तो बेहिचक उसका हाथ पकड़कर पंगत से उठा दीजिये और कुँवे से पच्चीस बाल्टी पानी निकलवाकर पहले उसका कोलेस्ट्रॉल कम कीजिए फिर पत्तल परोसिये उसकी ।


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